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पहेली

मैं हमेशा एक पहेली थी  अब भी हूँ आगे भी रहूंगी  मुश्किल है समझ पाना मुझे  जो भी मिला उसके साथ हो लिए  जो छूट गया पीछे उस पर रोये नहीं कभी  ज...

शनिवार, 14 सितंबर 2024

मेरे ख्वाब

रात कली कोई ख्वाब में आई 

और गले का हार हुई 

हँसता हुआ था उसका चेहरा 

आँखों में कोई रंग था गहरा 

होठ गुलाबी, आँख शराबी 

चाल में मादकता झलकी थी 

जब मैं सुबह को नींद से जागा 

खोया - खोया खुद को पाया 

थका - थका सा मन बोझिल था 

कहाँ गई वो हुस्न की मालिका 

जिससे आँखें चार हुई थी 

काश वो मेरे सामने होती 

कुछ अपने जज़्बात सुनाता 

नए - नए मैं गीत बनाता 

शायर बन उसको बहलाता। 

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