मेरी कविता, मेरी अभिव्यक्ति
तील-तील जलकर जीना सीखा अपनों से कुछ कहना सीखा हँसना सीखा, रोना सीखा हर गम को अब पीना सीखा धूप - छाँव को सहना सीखा नरम - गरम और ऊंच - नी...
आदमी है आदमी से आज परेशान
हर आदमी अंदर से है डरा-डरा
कब कौन ऐसा मिल जाये
जो ठग के ले जाये सब कुछ
हर बात पर है धरना का ख़ौफ़
राह रोककर खड़े हो गए
सबकुछ अस्त-व्यस्त कर डाला
ज़िन्दगी को संवार सकते नहीं
बिगाड़ने पर आतुर हर दम रहते है।
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