मेरी कविता, मेरी अभिव्यक्ति
जबतक रहेगी ए ज़िंदगी शिकायतों का दौर भी रहेगा किसी से प्यार तो किसी की नाराज़गी भी मिलेगी कोई आएगा करीब तो कोई मुँह फुला कर दूर चला जाएगा ...
आदमी है आदमी से आज परेशान
हर आदमी अंदर से है डरा-डरा
कब कौन ऐसा मिल जाये
जो ठग के ले जाये सब कुछ
हर बात पर है धरना का ख़ौफ़
राह रोककर खड़े हो गए
सबकुछ अस्त-व्यस्त कर डाला
ज़िन्दगी को संवार सकते नहीं
बिगाड़ने पर आतुर हर दम रहते है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें