रोज़ सवेरे मेरे आँगन
चिंटू - मिंटू, चिंकी - मिन्की
ढेरो बच्चे आते है
उछल - कूद कर हमें हँसाते
प्यार से मेरी गोदी में आते
अपनी मीठी तुलतुलाती सी
नए - नए शब्दों से मुझको
अपनी बात बताते है
थोड़ा रोना, थोड़ा हंसना
पूरी मस्ती करते है
हँसी ख़ुशी जब घर वो जाते
बाय - बाए जब करते है
उनके चेहरे की खुशियों से
अपना दिन बन जाता है
सोच - सोच मैं इनकी बाते
इतनी खुश हो जाती हूँ
अपनी मुश्किल भूल हमेशा
इनके संग हो लेती हूँ
इनके बचपन के संग - संग में
अपना बचपन जी लेती हूँ
मेरे आँगन हर दिन आये
ऐसे ही बचपन का झोंका
जिनमे झूम के मैं गाऊँ
हर दिन खुशियों से भर जाऊँ ।
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 16 एप्रिल, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंआपका बहुत बहुत धन्यवाद !!
हटाएंबचपन की याद दिलाती सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंधन्यवाद 🙏
हटाएंबच्चों संग खुद का बचपन भी जी उठता है
जवाब देंहटाएंआपने बिलकुल सही कहा :D
हटाएंबच्चों के संग बच्चे बन जाना अच्छा लगता है न?
जवाब देंहटाएंबिलकुल :)
हटाएंऐसा ही हो ! आपके आँगन में बचपन खिलखिलाता रहे हमेशा ।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद 🙏
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