जब बिटिया अपने माँ-बाप के लिए
अपनी खुशियां भी छोड़ देती थी
अपनी माँ के लिए हमेशा पहले सोचती थी
शादी के बाद पति की ख़ुशी ही उसका सब कुछ होता था
ससुराल की मर्यादा ही अपना धर्म समझती थी
ममता इतनी की कभी कम नहीं पड़ती थी
अपनी आंसुओं को ऐसे छुपाती
जैसे पहले कभी रोया ही न हो
माँ के रूप में अपने बच्चे के लिए
अपनी परवाह कभी नहीं करती
कहाँ गयी वो बेटियाँ जो संसार का सूत्र थी
अब तो हमेशा जान लेने की बात करती है
पहले सबकी खुशियों पर न्योछावर होने की बात करती थी
अब पुरे घर की खुशियाँ पलभर में छीन लेती है
न पिता के इज़्ज़त की परवाह है
और ना ही माँ की ममता की।
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 29 जून, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंसही है विभा जी! बेटियों की संवेदनशीलता अब खोती जा रही है उनमें वो परम्परागत स्नेह और आत्मीयता नज़र नहीं आते! एक बहुत ही भावुक कर देने वाले विषय पर ध्यान दिलाती हैआपकी रचना 🙏
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