मैंने चाहतों की साड़ी उम्मीदे छोड़ दी
खुश रहने लगा हूँ जबसे उम्मीदे छोड़ दी
यूँ ज़िन्दगी को अक्सर जिया हूँ मैं
गरजती बारिशों में भी सूखा रहा हूँ मैं
काली घटाओ में भी रौशनी की चाह रखता था
ज़िन्दगी चाहतों से लवरेज़ थी मेरी
पर तन्हाइयों ने कुछ इस कदर तोड़ दिया
आज खुशियाँ भी काटने को दौड़ती है
रंग बिरंगी खुशियों के बीच
हम कब अकेले हो गए पता ही नहीं चला।