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प्यारे बच्चो

यूँ ही प्यार जताना बच्चो  मेरे संग आ जाना बच्चो  हँस - हँस कर दिखलाना बच्चों  घूम फिरकर हंसी - ठिठोली  मुझसे तुम कर जाना बच्चो  नन्हे-नन्हे ...

मंगलवार, 20 मई 2025

प्रतिक्रिया

अपनी प्यार पर प्रतिक्रिया देने में 

मैं हमेशा देर कर देती हूँ 

जब ये कहना था कि हमें भी तुमसे प्यार है 

तब भी मैं चुप ही रही 

अपने फ़र्ज़ को ही महत्व दिया 

ख़ामोशी से ही अपने प्यार को दफना दिया 

मैं ख़ामोश तब भी रही 

आज भी खामोशी में ही जिए जा रही हूँ 

मेरे फ़र्ज़ ने मुझे हमेशा रोक के रखा 

दिल चाहता था आसमानों में उड़ना 

वादियों में घूमना, प्रकृति को निहारना 

पर किस्मत को कहाँ था मंज़ूर 

पैरों में जकड़ी थी फ़र्ज़ की बेड़ियाँ 

 वक्त कम था अरमान बड़े थे 

इच्छाएँ सस्ती थी, ज़रूरते महंगी 

एक को चुना तो दूसरी हाथ से फिसल जाती 

दूसरे को पकड़ना चाहा तो 

पहली आँख से ओझल हो गयी 

इन सब में सामंजस्य बिठाते - बिठाते 

पता नहीं कब इच्छाएँ फ़र्ज़ में बदल गयी 

पता ही नहीं चला। 

रविवार, 11 मई 2025

महिला दिवस

नारी को महिला दिवस के दायरे में नहीं बाँध सकते 

नारी का हर पल एक प्रयोग है एक रोमांच है 

नारी हर दिन एक नई कहानी लिखती है 

नए प्रयोग करती है और जग को ख़ुशी का संदेश देती है 

नारी के लिए हर दिन नया है सब कुछ अलग है 

नारी हर पल को जीती है हर पल को संजोती है 

कभी माँ तो कभी पत्नी तो कभी गुरु का फ़र्ज़ निभाती है। 

बुधवार, 5 मार्च 2025

प्रियतम

हे प्रियतम तुम रूठी क्यों 

है कठिन बहुत पीड़ा सहना 

इस कठिन घड़ी से जो गुज़रा 

निःशब्द अश्रु धारा बनकर 

मन की पीड़ा बह निकली तब 

है शब्द कहाँ कुछ कहने को 

धीरज धरने का धैर्य कहाँ 

अपने बस में कुछ आज नहीं 

मन को कैसे बहलाऊँ मै

कैसे समझाऊं तेरे बिन 

जीवन पथ पर बढ़ जाऊँ मै

तेरा कुढ़ना तेरा चिढ़ना 

सब आज मुझे तड़पाता है 

कहता है दिल कोई बात नहीं 

तुम लौट के फिर आ जाओ ही 

हम ऐसे ही जी लेते जैसे जीते थे अब तक 

कोई गिला कोई है शिकवा 

है आज नहीं मेरा तुमसे 

वो सुबह शाम वो रात कहाँ 

सब सुना - सुना आज यहाँ

मैं भूल गया जीना तेरे बिन 

हँसना और रोना तेरे बिन। 

सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

उलझन

उलझन सुलझाऊँ मै कैसे 

अपने मन की बताऊ मै कैसे 

दिल चाहता है क्या 

सबको समझाऊं मै कैसे 


वक्त है कठिन दौर का 

गुज़र रहा हर रिश्ता 

नाज़ुक दौरे से 

गांठ हर रिश्ते में इतना 

कि उसे सुलझाऊँ मै कैसे 


हृदय में पीड़ा अपार है 

खुशियों की जगह घृणा ने ली है 

चाहत पर भारी नफरत की सवारी 

विश्वास ही रिश्ते की डोर है 

इन सबको समझाऊं मै कैसे 


इस काली रात की

कोई तो सुबह आएगी 

नफरत भरे दिल में 

फिर से खुशियां भर जाएगी 

शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

माँ

माँ छोड़ चली उस लोक चली 

जिससे नहीं लौटता कोई कभी 

हमसे अपना मुँह मोड़ चली 

ममता का दामन छोड़ चली 

कुछ याद मेरे दिल में दे कर 

कुछ दर्द में हमको छोड़ चली 

धुंधली तस्वीर बनाती हूँ 

मन ही मन में खो जाती हूँ 

खुद से खुद को समझाती हूँ 

जो आता है वो जाता है 

यह जीवन क्रम सिखलाता है 

अब दृश्य सभी सपने बनकर 

आँखों के आगे मंडराते 

माँ का हँसता चेहरा ऐसे 

जैसे कुछ कहना चाह रही 

माँ छोड़ चली उस लोक चली 

जिससे नहीं लौटता कोई कभी। 

शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

स्वभाव

 स्वभाव अपना इतना कोमल था 

कि सब अपने - अपने से लगे 

मन में चीनी सी मिठास थी 

तो स्वभाव में गुड़ सी कोमलता 

पर इस रुखरे संसार ने सब बेकार कर दिया 

हर पग पर नई चोट खाई 

हर ठोकर पर अरमान टूटे 

हर रिश्ते ने तोहफ़े में कटुता दी 

हर रिश्ता चोट दे कर इतराया 

किसी ने बदकिस्मत तो किसी ने निकम्मा बताया 

किसी ने भिखमंगा तो किसी ने चोर तक ठहराया 

हद तो तब हो गयी जब 

जिस घर को अरमान से सजाया 

उसी घर ने घर तोड़ने का इलज़ाम हम पे लगाया 

उस दिन वाकई अपने अंदर कुछ टूट सा गया 

कुछ बिखर सा गया 

बार - बार अपने आप से सवाल करते रहे 

क्या रिश्ता इसी का नाम है 

पर इस कोमल मन को फिर भी समझ न आया 

कोई तो अपना होगा 

कोई विश्वास करेगा 

जब वक्त हमारा होगा 

सब कोई अपना होगा 

सबको सच्चाई दिखेगा 

पर ऐसा क्या कभी होगा 

जब सब कुछ अच्छा होगा?

बुधवार, 8 जनवरी 2025

अभाव

अभाव, जिसका कोई भाव नहीं 

ऐसा ही है अपना जीवन 

पिता से प्यार तो 

दादी का अभाव मिला 

घर सुन्दर 

उसमे प्यार का अभाव मिला 

रिश्ते खूब मिले 

पर प्रशंसा का अभाव मिला 

नाम तो खूब मिला 

पर अर्थ का अभाव मिला 

चलते रहे निरंतर 

पर मुकाम का अभाव मिला 

काम अच्छे - अच्छे करे 

पर कामयाबी का अभाव मिला 

मिला सबकुछ 

पर सुकून का अभाव मिला ।