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प्रियतम

हे प्रियतम तुम रूठी क्यों  है कठिन बहुत पीड़ा सहना  इस कठिन घड़ी से जो गुज़रा  निःशब्द अश्रु धारा बनकर  मन की पीड़ा बह निकली तब  है शब्द कहाँ कु...

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

नयी सुबह

आज सुबह जब नींद खुली तो, ऐसा लगा
जैसे फूलों का ख्वाब
जैसे सपनो की रात
जैसे जीवन की बात
जैसे उलझन हो साथ
जैसे मन हो उदास
जैसे सूरज की बात
जैसे पहली किरण
जैसे मन का हिरण
जैसे लागी लगन
जैसे तुमसे मिलन
जैसे चिड़ियों के कलरव से जागा ये मन
जैसे वर्षो से स्वप्न से जागी हूँ आज!

आज सुबह जब नींद खुली तो
परिवर्तन कुछ खास दिखा
सुबह-सवेरे चहल पहल थी
हर मुख पे मुस्कान दिखी
सुबह सुहानी, शाम निराली
मौसम में अजब खुमार दिखा
साफ सफाई की बातें अब
लोगों की दिनचर्या हैं
ऑफिस में भी बाबू अब
काम के लिए तैयार दिखे
हेलो हाय से दूरी थी

बस राम-राम का नाम दिखा!!

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