जब एक औरत की कल्पना हम करते हैं तो हमारे
दिमाग में हमेशा होता हैं एक बेचारी, चुपचाप किसी कोने में खड़ी अपने तमाम रिश्तों
के बोझ तले दबी एक छाया, जिसका अपना कोई वजूद नहीं. कभी बेटी, कभी बहन तो कभी
पत्नी और फिर माँ, चाची, मौसी, दादी और नानी के रूप में अपने कर्त्तव्य का
भलीभांति निर्वहन करती रही शिकायत कभी न करे. आवाज़ होकर भी बेजुबान रहे. ग़लतियों
को देखकर भी चुपचाप रहे. समझ कर भी नासमझ बनी रहे. देख कर भी अनदेखा कर दे. लेकिन
हम ये कल्पना क्यों नहीं कर सकते कि जो सृजन करती हैं वो विकास भी कर सकती हैं और
अगर उसकी सोच भटक जाए तो उसके लिए विनाश भी कोई बड़ी चीज़ नहीं हैं. पर हमारे समाज
की विडंबना ही कही कही जायेगी कि वह विनाश तो चाहता हैं पर विकास नहीं. हम अपनी जिस
ऊर्जा को विनाश लीला की रूपरेखा तैयार करने में लगा देते हैं अगर उसी ऊर्जा को
विकास के लिये लगाया जाए तो हमारी सोच, हमारा समाज और सबके साथ हम विकास और विचार
की गई उचाईयों को छु सकते हैं. मैं इन सबके लिए सिर्फ पुरुष समाज को ज़िम्मेदार
नहीं मानती, इसके लिए अगर सच में कोई ज़िम्मेदार है तो वह हैं औरत क्योंकि वो माँ
हैं. अगर जन्मदात्री ही अपने संतान के हक़ की रक्षा न कर पाए और उसके विरोध में खड़ी
हो जाए तो फिर पहली लड़ाई तो वह बच्चा पहले दिन ही हार गया. ख़ैर ये बात बहुत लंबी
हो सकती लेकिन मैं इस कहानी के माध्यम से समाज में पसरी हुई उस बीमारी की ओर ध्यान
दिलाना चाहती हूँ जहां हम चाँद पर तो पहुंच गए हैं. पुरुष और महिला को बराबर में
खड़े करने के लिए तमाम कानून भी बना दिये लेकिन हम अपने मन में पुरुष और महिला को
बराबरी का दर्जा आखिर कब दे पाएंगे. आज हमें इसके लिए आत्ममंथन की सख़्त ज़रुरत हैं.....
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जीना सीखा
तील-तील जलकर जीना सीखा अपनों से कुछ कहना सीखा हँसना सीखा, रोना सीखा हर गम को अब पीना सीखा धूप - छाँव को सहना सीखा नरम - गरम और ऊंच - नी...
शनिवार, 8 अप्रैल 2017
शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017
मन की बात
रात का सपना
कब होता हैं अपना
रोज़ का रोना हैं यह
फिर तुम क्यों डरते हो
करना जो तुम वही करो
पर कुछ भी दर कर न करो!
करना हैं जो करो
मन को अपने वश में करो
सोचों न जो बीत गया
पर आने वाले दिन को जियो!
करना हैं जो करो
चाँद की दूरी घटती जा रही हैं
पर अपनों के बीच चाँद से भी बड़ी दूरी हैं
हर आदमी की अपनी एक मजबूरी हैं!
करना हैं जो करो
सबकुछ अपने वश में हो
ऐसा वहम कभी न करो
जी लो हर दिन को
चाहे खट्टा हो या मीठा
अनुभव तो अनुभव हैं
कभी तो काम आएगी
आँखों में आँसू दे कर हो
या चेहरे पर मुस्कराहट
हर कीमत पर ज़िन्दगी
एक अनमोल हीरा हैं
इसको सहेज के रखना ही हैं
प्रभु की बंदगी!!
मंगलवार, 4 अप्रैल 2017
सज़ा
एक दिन की बात हैं, रात के भोजन के बाद मैं अपने
कमरे में खिड़की के पास खड़ी थी. बाहर चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था. ठंडी-ठंडी हवा
चल रही थी. सड़कें सुनसान होने लगी थी. बिजली के खम्भे पर लगी बड़ी-बड़ी लाइटें इस तरह
रौशनी बिखेर रहे थे मानो चांदनी रात ने सड़को पर सफ़ेद चादर बिछा दी हो. सब कुछ कितना
अच्छा लग रहा था कि तभी सन्नाटे को चीरती हुई एक महिला तेजी से सड़क पर भागती हुई आई और अपने गोद से ऐसे लगा मानो कोई
कपड़े की गठरी ज़मीन पर रख रही हो, सड़क के किनारे रख कर तेज़ी से भागती हुई अँधेरे
में विलीन हो गई. जबतक मैं यह समझ पाती कि आखिर माजरा क्या हैं वह तो अँधेरे में
ग़ायब हो चुकी थी. कुछ ही पल में वहां कुछ कुत्ते आकर तेज़-तेज़ भौंकने लगे, मैं समझ
नहीं पा रही थी कि आखिर वहां हो क्या रहा हैं. मैं नीचे जाऊं या नहीं, मेरा मन
आशंकित होने लगा. कई तरह के बुरे-बुरे विचार मन में आने लगे. मैं अनमने ढंग से सड़क
से अपनी नज़र हटा कर पीछे की ओर चल पड़ी तभी पी०सी०आर वैन की आवाज़ सुनाई दी.
पी०सी०आर वैन वहां आकर रुकी, कुछ पुलिसवाले वैन से उतरे और उस गठरी को चारों ओर से
घेर लिया. तभी मेरी नज़र एक पुलिसवाले के हाथ पर गई और मेरी नज़र वही की वही ठिठक
गई, मेरे हाथ-पैर ऐसे कांपने लगे जैसे उस पुलिसवाले ने मेरी ही कोई चोरी पकड़ी है
लेकिन मेरी यह दशा तो उस पुलिसवाले के हाथ में उस नवजात बच्चे को देखकर हुई थी.
उसकी टुकड़-टुकड़ ताकती गोल-मटोल सी आँखें पुलिसवाले को ऐसे देख रही थी मानो कुछ
कहने को बेचैन हो. यह सोच-सोचकर मेरे हाथ-पैर ठन्डे हो रहे थे कि अब उस बच्चे का
क्या होगा? कौन उसे अपनाएगा? आखिर उस बच्चे का कुसूर क्या था कि उसकी माँ ने उसे
इतनी कठोर सज़ा दी? क्या उसकी माँ को तनिक भी ख़ुशी नहीं हुई होगी उसके जन्म पर?
क्या वह माँ नहीं बनना चाहती थी? या फिर किसी के द्वारा छली गई थी? जो भी हो लेकिन
वह तो अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो गई पर अब उस बच्चे का क्या जिसे वह मरने के लिए
छोड़ गई हैं? यह सज़ा तो उसे उस जानवर को देनी चाहिए थी जिसने उसे यह सब करने को
मजबूर किया, फिर उसने यह सज़ा उस बच्चे को क्यों दी. यह सज़ा तो उसे अपने आपको देनी
चाहिए थी. बगैर सोचे समझे उसने यह कदम उठाया. तब उसने क्यों नहीं सोचा कि इसका
परिणाम क्या होगा और जो वो कर रही हैं वो सही नहीं हैं. यह सोचते-सोचते मेरी आँख
कब लग गई मुझे पता ही नहीं चला.
जब
मेरी आँख खुली तो सुबह हो चुकी थी. फिर सब कुछ वैसा ही था, जैसा पहले हुआ करता था.
मेरा मन थोड़ा भारी-भारी सा लग रहा था. मैं समझ नही पा रही थी कि रात जो घटा था वो मेरा
सपना था या सच, मैं बार-बार अपने मन को तसल्ली दे रही थी कि काश वो मेरा सपना ही
हो पर तभी मेरे नौकर कि आवाज़ आई , “मालकिन आपसे मिलने इंस्पेक्टर साहब आए है.”
इतना सुनते ही एक बार फिर मेरे आँखों के सामने वो पूरी घटना चलचित्र की तरह घूम गई
और मैं फिर अजीब-सी उलझन में पर गई पर फिर नौकर की आवाज़ सुन मेरी तन्द्रा भंग हुई.
मैं अनमने ढंग से उठी और नीचे की ओर चल दी. जब मैं नीचे पहुँची तो देखा ड्राइंगरूम में दो पुलिसवाले बैठे हुए थे. मुझे देखते ही वह उठ खड़े हुए और बोल पड़े, “मैडम हमे
आपसे कुछ जानकारी लेनी थी इसलिए आपको परेशान करने चले आए.”
“अरे नही कोई बात नही आप बैठिये और बताइए कि
कैसे आना हुआ.” पुलिसवाले ने कहा, “मैडम आपके घर के पास रात एक बचा पड़ा मिला था उसी
के संबंध में कुछ जानना चाहते है.”
“हाँ, मुझे पता है.”
“आपको पता है?”
“हाँ, क्योंकि जिस वक्त आपकी गाड़ी मेरे घर के नीचे रुकी थी तो सायरन की आवाज़ सुन कर मेरी भी नींद खुल गई थी. मैंने रात को सबकुछ
देखा था. अब वो बच्चा कैसा है? कुछ पता चला उसके बारे में?”
“नही, हमलोग कोशीश कर रहे हैं, अख़बार में भी इश्तहार दे दिया हैं. ताकि कहीं से कोई खबर मिल जाए. हमने अभी अनाथ आश्रम वालों को बुलाकर बच्चा उनको सौप दिया हैं. बच्चा अभी बिल्कुल स्वस्थ हैं. मैडम आपने उस महिला का चेहरा थोड़ा बहुत तो देखा होगा. नहीं उपर से अँधेरे में मुझे कुछ ठीक से नहीं दिखा. ठीक हैं अगर आपको कुछ भी याद आता हैं तो आप जरूर बतायेंगी. हमें उस महिला को खोजने में आसानी हो जाएगी. बिल्कुल सर.
उसके बाद पूलिस वाले तो चले गए लेकिन मेरी उलझन और बढ़ गई. इसी सोंच में मेरा पूरा दिन निकल गया. अगले दिन फिर पुलिश वाले हमारे घर आ गए. सर अब क्या हुआ मम उसी केस के सिलसिले में आयें हैं. कुछ पता चला. जी कुछ खास नहीं लेकिन बच्चे के लिए एक अच्छी हैं खबर ज़रूर है”
उसके बाद पूलिस वाले तो चले गए लेकिन मेरी उलझन और बढ़ गई. इसी सोंच में मेरा पूरा दिन निकल गया. अगले दिन फिर पुलिश वाले हमारे घर आ गए. सर अब क्या हुआ मम उसी केस के सिलसिले में आयें हैं. कुछ पता चला. जी कुछ खास नहीं लेकिन बच्चे के लिए एक अच्छी हैं खबर ज़रूर है”
“क्या??”
“अखबार में बच्चे के विषय में पढ़कर किसी व्यापारी दंपति का फ़ोन हमारे पास आया था कि हम उस बच्चे को गोद लेना चाहते है.”
“यह तो बड़ी ख़ुशी की बात है.”
“हाँ, अगर उस बच्चे के विषय में एक-दो दिन में
कुछ नही पता चला तो हम लोग उसे उस दंपति को दे देंगे ताकि उसकी परवरिश सही ढंग से
हो सके.”
यह सब सुन मेरे मन से तो जैसे एक बहुत बड़ा बोझ
उतर गया और मैं पहले की तरह ही तरोताज़ा महसूस करने लगी. काश इस वेदना को उसकी माँ भी समझ
पाती.
सोमवार, 3 अप्रैल 2017
नयी सुबह
आज सुबह जब नींद खुली तो, ऐसा लगा
जैसे फूलों का ख्वाब
जैसे सपनो की रात
जैसे जीवन की बात
जैसे उलझन हो साथ
जैसे मन हो उदास
जैसे सूरज की बात
जैसे पहली किरण
जैसे मन का हिरण
जैसे लागी लगन
जैसे तुमसे मिलन
जैसे चिड़ियों के कलरव से जागा ये मन
जैसे वर्षो से स्वप्न से जागी हूँ आज!
आज सुबह जब नींद खुली तो
परिवर्तन कुछ खास दिखा
सुबह-सवेरे चहल पहल थी
हर मुख पे मुस्कान दिखी
सुबह सुहानी, शाम निराली
मौसम में अजब खुमार दिखा
साफ सफाई की बातें अब
लोगों की दिनचर्या हैं
ऑफिस में भी बाबू अब
काम के लिए तैयार दिखे
हेलो हाय से दूरी थी
बस राम-राम का नाम दिखा!!
रविवार, 2 अप्रैल 2017
अपनों का गाँव
चलो गाँव की ओर चले
कुछ कदम प्रगति की ओर चले
शहरों में जीवन भूल गए
अपनों के साथ भी छूट गए
जीवन जीने की राह चले
अब तो अपनों के गाँव चले!
चलो गाँव की ओर चले
गाँव की पंचायत कहाँ हैं
यहाँ पार्क में इक्के-दुक्के
लोग दिखाई देते हैं
और उन पर भी पैसे का
खुमार दिखाई पड़ता हैं!
चलो गाँव की ओर चलो
वहां दिल वालों की बस्ती हैं
जहां बजते ढोल-नगाड़े हैं
हर कोई खुश जहां रहता हैं
छोटे-छोटे हैं घर
पर उसमें ढेरों खुशियाँ रहती हैं!
चलो गाँव की ओर चलें
जहां उम्र का कोई न बंधन
जहां बुढापा नहीं सताती
कोई अकेलापन नहीं होता
अपनों का वहां गम नहीं होता
सपनो की कीमत नहीं लगती!
चलो गाँव की ओर चले
सब मिल बैठे पंचायत करे
एक दूजे के अनुभव से
अपने गाँव को फिर आबाद करे
सूनी गलियाँ, सूनी सड़के
अब फिर से हैं झूम उठी
आया मेरा अपना कोई!
चलो गाँव कि ओर चले!!
शनिवार, 1 अप्रैल 2017
माटी
हैं कसम मुझे इस माटी की
मैं इसका कर्ज चुकाउंगी
जीवन इस माटी से है बना
एक दिन माटी में मिल जाउंगी
पर इस माटी के गौरव को
एक मंजिल दे कर जाउंगी
कुछ इस माटी को देकर के
कुछ इस माटी से लेकर के
सब माटी में मिल जाता हैं
पर इस माटी की खुशबू से
आनंद सभी को आता हैं
कुछ को इसका अनुमान लगा
कुछ अनजाने ही चले गए
कुछ ने माटी का मोल समझ
उसके कीमत को पहचाना
कुछ ने अपनी खातिर इसको
हर दम बदनाम किया करते
कभी जाति तो कभी मजहब के
छोले में दर्द दिया करते
जिसने इसकी कीमत जानी
इतिहास में नाम वो दर्ज हुआ
हैं गर्व उसे इस माटी पर
जिसने हैं उसको जन्म दिया
इसमें पलकर वह बड़ा हुआ
इसका गौरव बन पाया वह
हैं कसम मुझे इस माटी की
मैं इसका क़र्ज़ चुकाउंगी!!
शुक्रवार, 31 मार्च 2017
कोशिश
बूंद-बूंद से घट भरता हैं
नदी-नदी से सागर
जल के निर्मल जीवन-सा ही
अपना जीवन कर दो!
चंद पल अपने जीवन का सेवा में लगा दो
हजारों दुखियों के चेहरे पर मुस्कान आएगी
अनजाने डर को अपने जीवन से भगा दो
कोशिश को अपना मकसद बना लो
सफलता एक दिन द्वार खटखटाएगी!
लोग कहते हैं गैरों के लिए जीओ
मैं तो कहती हुईं सिर्फ अपने लिए जीओ
इमानदारी से अपने और अपने रिश्तों
के लिए जी के तो देखो
जिंदगी सुहावनी अपने आप बन जाएगी
जब हम खुश होंगे तो हमारे आस-पास का
माहौल खुशनुमा अपने आप बन जाएगा!
छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ ढूँढो
बड़ी तो अपने आप मिल जायेगी
ज़िन्दगी बड़ी कीमती हैं
इसे शिद्दत से जी लो
कुछ अपने कुछ अपनों के लिए करो
कुछ अपने कुछ अपनों के लिए करो
बार-बार ऐसा मौका कहा आएगा!!
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