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प्यारे बच्चो

यूँ ही प्यार जताना बच्चो  मेरे संग आ जाना बच्चो  हँस - हँस कर दिखलाना बच्चों  घूम फिरकर हंसी - ठिठोली  मुझसे तुम कर जाना बच्चो  नन्हे-नन्हे ...

रविवार, 9 जुलाई 2017

वीर सपूत

तुझे कोटि-कोटि है नमन
तू वीर है सपूत
मातृभूमि तेरा फर्ज है
रुके न तू झुके न तू
यही मेरी पुकार है
रुके न तू थके न तू
सदा चले आगे बढ़े
तू वीर है प्रहार कर
तू अपना पहला वार कर
हिरण सी तुझमे फुर्ती हो
हाथियों का बल हो
भुजा-भुजा फड़क रही
हिला गगन डरा पवन
तू ऐसी ही चीत्कार कर
हिन्द की पुकार है
तू सिंह सा दहाड़ कर
तू लक्ष्य अपना भरद कर
दुनिया को दिखा दे!! 

शनिवार, 8 जुलाई 2017

गुड़िया

मेरी गुड़िया की कहानी
है बड़ी ही निराली
जग झूमे गाए घूमने को जाए
पर मेरी दुनिया
गुड़िया के इर्द -गिर्द  ही कटती
सोने में गुड़िया
जागो तो हाथ  में गुड़िया
पूरी गुड़ियों की बारात है
 मेरे बिस्तरे पर उनकी ही सरकार है
जहाँ देखो गुड़िया
अपनी धुन में सजी बैठी है
गुड़िया से सजा घर
दीवालों पर गुड़िया की तस्वीर
रजाई और गलीचों में भी
उन्ही की आवो हवा है
गुड़िया मेरी जिन्दगी
और मैं गुड़िया की छोटी सी अम्मा
पर एक ही मुश्किल हैं
मैं तो बड़ी हो गई पर
 मेरी गुड़िया अभी भी छोटी ही है
मेरे कपड़े बदल गए पर उसके वही है
मैंने दुनिया को जिया पर
वो आज भी मेरे भरोशे पारी है
आज मैंने जाना कि
ये मेरी गुड़िया तो कपड़ो की बनी है
अलविदा मेरी नन्ही सहेली
अब मै बड़ी हो गई हूं
अब तुमसे खेलना अच्छा नहीं लगता
अब तो मेरे बहूत सारे दोस्त है
तुम्हे अपने यादों में रखूंगी
भूल जाऊ मै जग को
पर तुम्हे नहीं भूल पाऊँगी...

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

चंद लम्हे

चंद लम्हों की ज़रूरत हैं 
खोई खुशियाँ ये हकीकत हैं 
चन्द्र साँसों की गनीमत हैं 
सांसे सस्ती ही हुई जाती हैं 
पैसा आज भी आसमां पे छाया हैं 
ख्वाहिशे दूर हुई हमसे 
अपने गैरों में हुए तब्दील अब तो 
गैरों से राहत की दुआं करते हैं
चंद लम्हों की ज़रूरत हैं 
हम तो खुशियों को ढूंढा करते हैं 
राते सुनसान सड़क दिखता हैं 
दिल में सब खोया हुआ दिखता हैं 
राहें अनजान बनके कटती हैं 
ज़िन्दगी तूफ़ान में फसी हैं 
नौकां मझदार में अटकी हैं 
चंद लम्हों की ज़रूरत हैं 
चाहे चंद लम्हे ही मिले 
पर वो खुबसूरत हो!!!!

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

खुशियाँ

ख़ुशी अंतरात्मा की आवाज है
ख़ुशी उसकी पहचान है
ख़ुशी बाजार में बिकती नहीं
वरना इसपर भी पैसेवालों
का ही हक़ होता
बड़ी-बड़ी दुकानों में
इसकी बोली लगती
खुशियाँ बाँटने से बढती है
छोटी सी है जिन्दगी
इसे खुशियों से गुजार दो
क्यों होड़ में लगे हो
ख़ुशी को अपने भीतर ही तलाशो
जागो मेरे मशीनी भाइयो
जिन्दगी जीने के लिए है
पैसे के बाजार में खोने के लिए नहीं
पैसे तो हम फिर भी यहीं छोड़ जायेंगे
जाएँगी साथ अपनी प्यारी सी हंसी
मनालो खुशियों का त्यौहार
गम को विदा कर देते हैं

ख़ुशी का स्वागत दिल खोलकर करतेहैं!!    

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

ज़िन्दगी का सफ़र

नींद से जागा हू कई बार
सो के क्यों चला हू बार बार
ठोकर खाकर गिरा हू हर बार
ज़िन्दगी का मतलब वक़्त ने समझाया मुझे
गैरों के बीच रहकर भी जीना सीखाया मुझे
हर पल को शिद्दत से जीया हमने
ज़िन्दगी में लाख मुश्किल हो पर
खुशियाँ काटों के बीच से ढूढ लाएँगे हम
हमेशा काटों के ताज सर पर  सजाया हमने
ज़िन्दगी हर कुछ बताना चाहती है
पर मौका लगते ही मुंह भी फेर लेती है
दर्द अपनों ने दिया हर दम पर
गिला वक़्त से कम नही मुझको
वक़्त हर बार ठोकर मार देती है
मज़िल जब पास आती है मेरे
कोशिश मैं भी नही छोड़ पाऊँगी
क्युकि ज़िन्दगी मिलती बड़ी मुश्किल से है
शायद हमे फिर से मौका मिले न मिले  

रविवार, 2 जुलाई 2017

वो पल

स्वर्णिम पल था वो जीवन का
दीपक जलता रहा रात भर
जोहते हम राह तेरा
राह पे पलके बिछा दी
फूलो से सपने सजाए
कुछ पलो को चूनकर के
उनका गुलदस्ता बनाया

स्वर्णिम पल था वो जीवन का
जब आपसे नज़रे मिली थी
आखों ही आखों में हम ने
बात दिल की छेर दी थी

स्वर्णिम पल था वो जीवन का
हम दोनों के बगीया में
दो-दो नन्हे फूल खीले
जीवन के हर लय को हमने
एक सूत्र में बांध दिये

स्वर्णिम पल था वो जीवन का
जीवन जब एक राह बनी
हँसी-ख़ुशी हमने राहों में
प्रेम फूल अर्पण कर दी

जीवन क्रम चलता रहता है
स्वर्णिम पल आता-जाता है
हर नए पूराने अनूभव से

कुछ सीख हमे दे जाता है!

शनिवार, 1 जुलाई 2017

डाकिया

रोज़ संदेशा लेकर आता
डाक सभी के घर पहुंचता
खाकी वर्दी पहन के आता
सर पर टोपी हाथ में चिठ्ठी
साईकल की घंटी के घन-घन
से अपनी पहचान कराता
सबसे करता राम-राम
कुशल छेम सबकी वो लेता
कभी ख़ुशी कभी ग़म लेके आता
संदेशों से उसका नाता
संदेशों का जीवन दाता
डाकिये की पहचान निराली
शहर हो या गाँव
हर कोई उसे जानता
हर घर में उसकी जगह होती
हर ख़ुशी में याद आता
ग़म में भी हमको रुलाता
डाकिया डाक लेकर आता
इंतज़ार हैं हमें डाकिये का
पत्र कब लाएगा
वो मेरे घर कब आएगा!!