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गुरुवार, 20 जुलाई 2017

मैं नीर भरी दूख की बदली

मैं नीर भरी दूख की बदली
मैं स्वप्न सुंदरी सी पगली
इस लोक धरा पर आ पहुची
इसके कण-कण में रचती-बसती
इसके आपात सदा सहती
मैं नयनो में नीर गढ़ा करती
धरती पत्थर पिघली न कभी
पत्थर पर फूल खिले न कभी
मैं सदा इसे घीसती रहती
वो दिन शायद आ जाए कभी
मैं किस्मत अपनी लिखूंगी
ले कलम सुनहरी हाथों में
जीवन परिवर्तन शील बने
गमगीन नहीं रंगीन बने
हर कदम प्रयास परिवर्तन का
मैं मायूस नहीं उल्लाशीत हू
मैं नीर भरी दूख की बदली
कुछ हर्षित हू कुछ चर्चित हू
हर दम परिवर्तन शील बनू
जीवन में कुछ जीवन्त बनू
कुछ अच्छे-अच्छे शब्द गढ़ु 
कोई छंद ख़ुशी का लिख पाती  
मैं नीर भरी दुःख की बदली 
कुछ नीर ख़ुशी का दे जाती

जीवन जीवंत बना जाती!!

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