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जीना सीखा

तील-तील जलकर जीना सीखा  अपनों से कुछ कहना सीखा  हँसना सीखा, रोना सीखा  हर गम को अब पीना सीखा  धूप - छाँव को सहना सीखा  नरम - गरम और ऊंच - नी...

मंगलवार, 21 मार्च 2017

गधा प्रसंग

वाह रे भाई
कैसे दिन हैं आए
गधे भी आज
वी.आई.पी जीवन में
अपनी जगह हैं बनाई
हर तरफ चर्चा है उसका
कोई पीछे रहना नहीं चाहता
गधे के नाम से
दिन की शुरुआत होती
तो शाम भी उसी के चर्चे से
गली का नुक्कड़ हो
या चुनावी जन सभा
हर तरफ गधा ही गधा हैं
पब्लिक हो या नेता
चर्चा ही चर्चा हैं
हम इंसान ने की कैसी
शामत है आई
गधो के बराबार भी
हमें भाव नहीं मिलता
टीवी कि टी.आर.पी भी
आज गधो को मिल रही हैं
हम तो बस उसके
गीत गाने में
अपना दिन बिता रहे हैं
ज़िन्दगी हो तो बस गधो सी हो
जिसके कायल
हमारे प्रधानमंत्री भी हैं
अपनी भी कोई ज़िन्दगी हैं
बस जिए जा रहे हैं
कोई चर्चा भी करता हैं
तो बस भीड़ का हिस्सा हैं
काश गधो कि तरह
अपना भी भाग्य होता हैं
रातों-रात सितारे बन जाते
वाह रे गधा

क्या किस्मत हैं पायी?!!!!

रविवार, 19 मार्च 2017

चुनावी सभा

सभा अब चुनावी सजा बन गई हैं
सभा जो सभी जातियों को बताती
सभा में सभी को अलग हैं बिठाती
ये तेरा इलाका, ये मेरा इलाका
तेरा जोड़ चल जाए तो वो जीतेगा
मेरा जोड़ चल जाए तो वो जीतेगा
गणित ये तभी फल सकेगा हमारा
जो जाति की जाती से होगी लड़ाई
इनकी लड़ाई में मेरी भलाई
सभी कुछ नया हो, नए रंग में हो
जनता हो जिससे भ्रमित हर तरफ से!

सभा अब चुनावी सजा बन गई हैं
जनता भी अब तो सजक हो गई है
चमक खो बिखर हैं रहा हित हमारा
उजड़ हैं रहा प्रेम मंदिर हमारा
इसे अब सवारे, सबक अब सिखाओ
ये नेता हमारे इन्हें अब सिखाओं
नहीं अब चलेगी बनावट की बातें
हमें चाहिए पूरा हक़ अब हमारा

सभा अब चुनावी सजा बन गई हैं!!

गुरुवार, 16 मार्च 2017

अच्छाई

फूल से खुशबू चूडाकर
भोरों ने फैलाया नभ में
जैसे खुशबू फैलती हैं
हवा के झोंके के सहारे
वैसे ही अच्छाई अपनी
छाप पीछे छोडती हैं
सौ बुड़ाई हारती हैं
एक सच्ची जीत से
सच का जो दर्पण दिखा दे
राह भटको को दिखा दे
फूलो से खुशबू चूडाकर
ज़िन्दगी अपनी सजा ले
आंधी की रफ़्तार को भी
थाम ले विश्वास से
हर किसी को ज़िन्दगी के
मायने समझा सके
दिल से दिल को जोड़ने की
हर कला अपना सके
गम के दामन में ख़ुशी के

फूल जो बरसा सके!

बुधवार, 15 मार्च 2017

धरा

हरा रंग हैं हरी हमारी
धरती की अंगड़ाई
केसरिया बल भरनेवाला
सादा हैं सच्चाई
केसरिया अब द्वार खड़ा हैं
जीवन नया बदलने को
फिर कब तक हम बाट देखते
जाती बंधन के बीच फंसे
आज़ादी के लिए तरसते
अपना भविष्य दूसरों के हाथ सौंप कर
खूदको अपराधी कहलाते
अपने ही काम के ख़ातिर
बख्शीश बाँट कर अपराध को
खुद ही हवा देते रहेंगे!

हरा रंग हैं हरी हमारी
धरती की अंगड़ाई
केसरिया बल भरनेवाला
सादा हैं सच्चाई
लेकिन अब नया सूर्योदय होगा
कीचड़ में भी कमल खिलेगा
मन से सारे मैल धुलेंगे
कमल की ही तरह
हमारी धरती को खिलना होगा
मोदी की अगुवाई में
देश को बदलना ही होगा
हर ओर ख़ुशियों की लहर होगी
जात-पात के बंधन से मुक्त
हमारी ये धरती होगी
राम-राम के जयघोष से
गूंज उठेगी ये धरती
विश्व गुरु बनने के लिए
हमने कदम बढ़ा दी हैं
अब मंज़िल पर पहुंच के ही दम लेंगे
हम भारत माता की संतान हैं
अपनी धरती को हरा-भरा
और माहौल को केसरिया बनाके ही दम लेंगे!!

मंगलवार, 7 मार्च 2017

बदलाव

हर रोज़ प्रकृति से दूर हो रहे
खतरे में अस्तित्व परा हैं
आज के मानव जाति का
वायु प्रदुषण चरम पे पहुंचा
जल धरती से दूर हो रहा
गर्मी अपने चरम पे पहुंची
ठण्ड ने बदला मिजाज़ अपना
वसंत आता हैं कब
और चला जाता हैं कब
हम सोचते रह जाते हैं
फाग के रंग भी फीके पड़ गए
रंग मिलावट के भेंट चढ़ गए
मिठास कड़वाहट में बदला
दिल से दिल की दूरी बढ़ गई
कोई किसी से गले न मिलता
गिले शिकवे दूर न करते
छोटी-छोटी बातों में भी
सबकी इगो आड़े आती
गाडी की आवाज ने हमको
दर्द के एहसास से दूर कर दिया
ज़िन्दगी की कीमत
शानो-शौकत के आगे फीकी पड़ गई
अपनों के प्यार की जगह
पैसो ने ले लिया
शहरों की तस्वीर बदली
पर हमने अपनी सूरत
कब बदल के रख दी
जिसका हमें पता ही नहीं चला
काश फिर से वही दिन और
वही रात आ जाती
हममें अपनों के लिए जीने का
फिर से हुनर आ जाता
प्रक्रति मेहरबान फिर से
हर ओर हो जाती!!

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

अनायास

अनायास ही आज हमारे मन में जागे वो पल
साथ-साथ हम तुमने मिलकर जिनमे रंग भरे थे
अनायास मन के आँगन में फिर से उत्सव जागे
कहाँ-कहाँ हम साथ-साथ कितने वसंत निकाले
पतझड़ के भी कितने मौसम साथ गुज़ारे हमने!

डाल हाथ में हाथ खड़े हैं मंदमंद मुस्काते
कितनी बार छोड़ तुम जाते मूक विवश मुद्रा में
अनायास फिर इन्द्रधनुष को देख मेरा मन मुस्काए
अगले पल ही गहन सोच में मैं फिर से खो जाती
अनायास फिर आज नयन में घूम गया वह आँगन
जहां सांझ कि बेला में हम साथ-साथ उतरे थे
प्रणय सफ़र का पहला दिन वो आज भी हैं हमे याद!

अनायास ही आज हमारे मन में जागे वो पल
साथ-साथ हम तुमने मिलकर जिनमे रंग भरे थे
गर्मी-सर्दी-वसंत-सावन बीते मौसम तमाम
जीवन के सुख-दुःख के भ्रम में
साथ तुम्हारा हैं हर पल में
अनायास ही आज हमारे मन में जागे वो पल

साथ-साथ हम तुमने मिलकर जिनमे रंग भरे थे!!

बुधवार, 1 मार्च 2017

रिश्ते नाते

रिश्ते नाते प्यार वफ़ा सब
ये सब तो अब सपना हैं
बँगला गाड़ी रूपये पैसे
इनसे सबको प्यार हैं आज
एक घर में दस-दस घर बनते
अजब-ग़जब संसार बना
जिससे कुछ मिलने की आशा
सबको उसी से प्यार हैं आज!

रिश्तों के आगे पैसों का
कैसा गर्म बाज़ार हुआ
जिसकी खन-खन से ख़ुशियाँ हैं
जिसके जाने से रोना हैं
अजब-ग़जब संसार की लीला
कैसा ये माहौल बना!

रिश्ते-नाते प्यार वफ़ा सब
ये तो बस पैगाम बना
अपने ही अपनों के दुःख से
कैसे अब अनजान बना
रूपये-पैसों की ताकत ने

सबको अपने बस में किया!!