कैसे-कैसे मै खुद को बदल रही हूँ
थाम कर हाथ मेरा साथ चल लो मेरे
आज हर कदम पर फिसल रही हूँ मै
कैसे कैसे मै खुद को बदल रही हूँ
तुम पर भरोसा था साथ देने का
राह में अपने कैसे-कैसे भटक रही हु मैं।
कैसे-कैसे मैं खुद को बदल रही हूँ
कहाँ पता था तुम ऐसे बदल जाओगे
थी बेफ़िक्र तुम्हारे साथ रहने से
अब ख़ौफ़ज़दा हूँ माहौल बदल जाने से।
कैसे-कैसे मैं खुद को बदल रही हूँ
ज़िन्दगी खिलती हुई धुप थी
अब मैं कबसे ढलती सांझ को निहार रही हूँ
सुबह और शाम में कम हो रहा है फासला।
कैसे-कैसे मैं खुद को बदल रही हूँ
पहले तो हवा की सरसराहट में भी संगीत था
अब तो संगीत भी मुँह चिढ़ाने लगा है
ढोलक की थाप से भी दम घुंटने लगा है
ज़िन्दगी हर दिन अपना रंग बदल रही है।