मेरे सपने आज भी कुछ इस कदर सहमे हुए है
चाहकर भी मुस्कुरा पाऊँ ना मैं
हर दिन ख़ुशी की चाह में आँखे हमारी नम हुई
बंद आँखों में भी सपने कभी ना तैरने
खोलकर आँखों को कैसे स्वप्न में विचान करूँ
मेरे सपने आज भी कुछ इस कदर सहमे हुए है
भोर से मायूसियो ने ढक लिया ऐसे मुझे
शाम ढलकर भी न कोई ख्वाहिशें जागी मेरी
पुरे दिन बोझिल थी आँखें आँसुओं के खोज में
मेरे सपने आज भी कुछ इस कदर सहमे हुए है
चाँद तारों की चमक भी आँख में चुभ सी रही।