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प्रियतम

हे प्रियतम तुम रूठी क्यों  है कठिन बहुत पीड़ा सहना  इस कठिन घड़ी से जो गुज़रा  निःशब्द अश्रु धारा बनकर  मन की पीड़ा बह निकली तब  है शब्द कहाँ कु...

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

भारत

विशाल भारत देश हमारा
नए-नए हैं रंग यहाँ पर
नयी-नयी भाषाएँ
हर प्रांत की अपनी भाषा
अपना पहनावा है
सबके इश्वर अपने-अपने
फिर भी दिल हैं एक
खान-पान और रहन-सहन में
हर ओर निरालापन हैं
नर से लेकर नारायण तक
इस धरती के वासी
काशी हो या विश्वनाथ हो
या कृष्णा का वृन्दावन
इस पावन धरती पर आए
नर के रूप में नारायण
राजा राम अयोध्यावासी
परती-पुरिश्वर साईं राम
मथुरावासी कृष्ण की लीला
जाने तीनो लोक
संतो की इस धरती को
गौतम बुध की वाणी ने
जोड़ दिया पूरी दुनिया से
बन गया बोध गया पावन धाम
ऐसा हैं इतिहास हमारा
विशाल भारत देश हमारा!

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