यह ब्लॉग खोजें

Translate

विशिष्ट पोस्ट

जीना सीखा

तील-तील जलकर जीना सीखा  अपनों से कुछ कहना सीखा  हँसना सीखा, रोना सीखा  हर गम को अब पीना सीखा  धूप - छाँव को सहना सीखा  नरम - गरम और ऊंच - नी...

बुधवार, 7 जून 2017

सूरज दादा

सूरज दादा आते हैं
जगमग जग कर जाते हैं
हर मौसम में खुशियों की
सौगात वो हमको देते हैं
ठंड के मौसम में धुप सेकना
सबको अच्छा लगता हैं
मिलजुलकर सब बैठ संग-संग
पिक्निक का आनंद हैं लेते
गप्पे-शप्पे हंसी-ठिठोली
चर्चा और परिचर्चा भी
सब मिलकर कर लेते हैं
जब आता वसंत का मौसम
सूरज की खिलती गर्मी से
पौधे मुस्काने लगते
चारों ओर हरियाली फैली
जग को भी महकाने लगती
पर ज्येष्ठ महीना आते-आते
हो जाते हैं सब बेहाल
अंदर हो या बाहर
ताबड़तोड़ पसीना गिरता
मन घबराने लगता सबका
सूरज दादा बस कर दो अब
और सहा नहीं जाता
आसमान में बादल छाते
झूम-झूम सब गाते
सूरज दादा घर को जाओं

बदरी बरसान आओं!!

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें